लोकेशन बुधनी
संवाददाता डॉ रमेश चंद शर्मा
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पितृपक्ष के पहले दिन बुधनी के ऐतिहासिक नर्मदा घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी, सुबह से ही लोग नर्मदा जी के पावन तट पर जाल बिछाकर बैठे और मंत्रोच्चार के बीच अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए जल अर्पण और तर्पण करते रहे, इस दौरान घाटों पर भावनात्मक दृश्य नजर आए जहां पुत्र और पौत्र नम आँखों से अपने पूर्वजों को याद कर आहुति दे रहे थे, पंडितों ने बताया कि पितृपक्ष की 16 दिवसीय अवधि में श्राद्ध और तर्पण करना पूर्वजों को तृप्त करने का श्रेष्ठ कार्य माना गया है, मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितृलोक से आत्माएँ धरती पर आती हैं और अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा रखती हैं, धार्मिक ग्रंथों में इसका महत्व महाभारत कालीन कर्ण कथा से जुड़ा है, कर्ण जब स्वर्गलोक पहुंचे तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोने-चाँदी के आभूषण मिले, कारण पूछा तो देवताओं ने बताया कि जीवनभर उन्होंने दान तो बहुत किया लेकिन कभी पितरों के नाम से भोजन का दान नहीं किया, तब भगवान यम की अनुमति से कर्ण को पंद्रह दिन के लिए धरती पर लौटकर श्राद्ध और तर्पण करने का अवसर मिला और तभी से यह परंपरा चली आ रही है, घाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी अपनी भावनाएँ साझा कीं, किसी ने कहा कि नर्मदा जी के पवित्र जल में तर्पण करना सौभाग्य की बात है तो किसी ने इसे पितरों से सीधा जुड़ाव बताया, श्रद्धालुओं का विश्वास है कि नर्मदा जी का पावन जल पितरों की आत्मा को तृप्त कर उन्हें मोक्ष प्रदान करता है और यही कारण है कि पितृपक्ष में बुधनी का नर्मदा घाट आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है.
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